यह दुकान बर्फ की घाटी के बीच बनी हुई है। यहां तक पहुंचने के लिए पैदल चढ़ाई चढ़नी होती है। रास्ते में कई मंदिर के दर्शन भी होते हैं। इस दुकान की शुरूवात 1981 में हुई, जब कई पर्यटक प्रकृति के दीदार करने और मंदिरों के दर्शन करने यहां पहुंचते थे तो उन्हें एक कड़क चाय की जरुरत महसूस होती थी। ऐसे में आर्थिक मजबूरी के चलते दिलबर सिंह और उसके भाई ने यहां दुकान खोली। धीरे-धीरे इस दुकान की लोकप्रियता बढ़ने लगी कि अब लोग इस दुकान को देखने के लिए भी यहां आते हैं।
यहां कई तरह की चाय मिलती है, जिनमें तुलसी, हर्बल और घी वाली चाय स्पेशल है। प्रकृति को निहारने के साथ-साथ कड़क चाय की चुस्कियां सारी थकान और तनाव को दूर कर देती है। ये दुकान सिर्फ 6 महीने के लिए खुलती है। चारधाम के कपाट बंद होने के साथ ही ये दुकान भी बंद हो जाती है। क्योंकि यहां 6 महीने बर्फ पड़ी रहती है और साथ ही चारधाम के कपाट बंद होने के बाद पर्यटक भी यहां नहीं आते हैं।
यह दुकान वेदव्यास की गुफाओं के पास स्थित है। कहते हैं कि इन्हीं गुफाओं में वेदव्यास ने महाकाव्य ‘महाभारत’ रचा था। यहां जो भी आता है वह एक फोटो तो जरूर खिंचवाता है और जब से स्मार्टफोन आए हैं, तब से तो लोग फोटो, सेल्फी और वीडियो सब बनाते हैं।
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